लाल किताब ज्योतिषी

हमारे पण्डित जी लाल किताब ज्योतिष के रचयिता पंडित रूप चंद जोशी का जन्म 18 जनवरी, 1898 को जालंधर (पंजाब) के फरवाला गांव में हुआ. इन के पिता का नाम था पं. ज्योति राम जोशी जो पंजाब रैवेन्यू विभाग के लिए काम करते थे व खेती की जमीन के भी मालिक थे. बचपन में ही पं. रूप चंद की माता का देहांत हो गया. घर में सब से बड़ा भाई होने की वजह से परिवार को संभालने का काम उन पर आ पड़ा. पं. रूप चंद जी का बचपन काफी कठिनाई में गुजरा. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था. उन की उर्दू की लिखाई बहुत ही सुन्दर थी और उर्दू भाषा पर भी अच्छा अधिकार था. शिक्षा उर्दू, फारसी व अंग्रेजी में हुई.

लाल किताब ज्योतिष के रचयिता पं. रूपचन्द जोशी जी

लाल किताब ज्योतिषी | lal kitab jyotish astrologer sahu ji has told some story which was shared by known friends who was close to pt. roop chand joshi ji.

लाल किताब ज्योतिष के क्षेत्र की संभवतः सबसे रहस्यमयी पुस्तकों में से एक है. यही एक पुस्तक है जो जितनी विवादित है उतनी ही सुलभ उपलब्ध भी. जहां इस किताब की कीमत 2000 रूपये के नजदीक तक पहुंच जाती है वहीं यह मात्र 20 रूपये में भी बाजार में मौजूद है. लाल किताब के विरोध के बावजूद इसके चाहने वालों की संख्या कम नहीं है। लाल किताब के विरोध की प्रमुख वजह इसकी न समझ में आने वाली विधि रही है तो भी इसमें दिए उपायों की सरलता की प्रशंसा इसके विरोधी भी करते हैं.

लाल किताब का सबसे बड़ा विवाद तो इसके लेखक पर है जो कहीं पं. गिरधारीलाल जी हैं, तो कहीं पं. रूपचन्द जोशी जी वहीं कुछ लोगों ने इसे अरूण संहिता और अरब देश से भी जोड़ा है. प्रस्तुत लेख योगराज प्रभाकर जी द्वारा हिन्दी में लिप्यांतरित लाल किताब के तीसरे हिस्से (1941) में प्रकाशित है. इसमें लाल किताब के लेखक के संबंध में हुई विभिन्न विचारधाराओं के बीच पं. रूपचन्द जोशी जी को इसके मूल लेखक के रूप में पेश करते हुए श्री राजिंदर भाटिया ने उनसे संबंधित अपने संस्मरण बताएं है. तो प्रस्तुत है लाल किताब के तीसरे हिस्से (सन् 1941) से संकलित ज्योतिष के महान पुरोधा पं. रूपचन्द जोशी जी की जीवनी.

जब पं. रूपचन्द जोशी जी की शिक्षा उर्दू, फारसी व अंग्रेजी में हुई उस समय के पंजाब में हिंदी भाषा ज्यादातर हिंदू औरतें ही पढ़ा करती थीं, पुरूष प्रायः उर्दू व अंग्रेजी ज्यादा, और हिंदी कम पढ़ते थे, इसी की वजह थी सरकारी काम काज का उर्दू व अंग्रेजी में होना. उर्दू हर कोई पढ़ता लिखता था, यह आम आदमी की भाषा थी.

यही वजह है कि लाल किताब उर्दू में लिखी गई ताकि आम आदमी इसे पढ़ सके. क्योंकि ज्यादा पढ़े लिखे लोग फारसी जानते थे, इस लिए कहीं कहीं फारसी के शब्द भी लाल किताब में इस्तेमाल किए गए. पं. रूप चंद जी ने चौथी व आठवीं कक्षा में वजीफे की परीक्षाएं पास कीं जो उन दिनों बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी. इस के लगभग सत्तर साल बाद भी पं. जी ने मुझे इसके बारे में बहुत गर्व से बताया. पं. जी ने अच्छे अंकों से मैट्रिक की परिक्षा पास की. इस के बाद वे कुछ दिन एक स्कूल में भी पढ़ाते रहे, व बाद में अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान होने की वजह से उन्हें भारत की डिफैंस एकाऊंट्स सर्विस में सरकारी नौकरी मिल गई जिस के कारण वे लाहौर, धर्मशाला, बम्बई, मद्रास, अंबाला छावनी, शिमला व अन्य कई स्थानों में रहे व गजेटिड पदवी तक पहुंच कर रिटायर हुए.

पं. जी की बचपन से ही प्रखर बुद्धि थी. इस के अतिरिक्त उन में कुछ ऐसी विशेषता थी कि बचपन में वे मवेशियों के माथे को देख कर उन के मालिकों के बारे में कई बातें बतला देते थे.

पर इस अन्तर्ज्ञान को उन्हों ने कभी गम्भीरता से नहीं लिया. मैट्रिक परिक्षा पास कर लेने के बाद उन्हें खुद-ब-खुद ही हस्तरेखा का ज्ञान हो गया. किसी की हथेली को देख कर वे पिछली बातें तो बहुत सही कह देते थे पर भविष्य के बारे में उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिल पा रही थी. उन्हों ने सोचा कि इस विषय पर कुछ और पढ़ना चाहिए. क्योंकि वे इस की तह में जाना चाहते थे इस लिए पहले खगोल (एस्ट्रानोमी) पढ़ने का इरादा किया व इस विषय पर कुछ किताबें पढ़नी शुरू कीं. अब तक पं. रूप चंद जी सरकारी नौकरी में आ चुके थे व उन के दो बच्चे भी हो चुके थे. उन की तब्दीली उन दिनों धर्मशाला, जिला कांगड़ा में हुई थी.

“क्या हुआ था, क्या भी होगा, शौक दिल में आ गया
इल्म ज्योतिष हस्त रेखा, हाल सब फरमा गया”

पं. जी अपने गांव फरवाला में अपनी पहली सालाना छुट्टियां बिताने के लिए गए थे. पहली ही रात उन्हें स्वप्न में एक अदृश्य शक्ति यानि गैबी ताकत जिस का चेहरा पं. जी ने कभी नहीं देख पाए, प्रकट हुई. यह था तो कोई पुरुष. पंडित जी (Lal kitab astrologer India) जब भी कोई कुंडली देखते, वे लाल किताब में से फलादेश पढ़ कर बोलते थे चाहे वो एक ही पंक्ति हो. आम तौर पर वे ग्रह के शुरू में लिखी हुई पद्य के अंश पढ़ते व उसी के अर्थ की ही व्याख्या करते वे अक्सर कहते कि वो कह गया है या वो लिखवा गया है.

इस गैबी ताकत ने उन्हें बताया कि उन्हें एक नए तरीके का ज्योतिष शुरू करने के लिए चुना गया है व वे इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पाएंगे. रात भर स्वप्न में उनकी शिक्षा चलती व सुबह पं. जी मन्त्र मुग्ध या अर्धचेतन अवस्था में नोटबुक में सभी कुछ लिखते जैसे कि कोई उन्हें हाथ पकड़ कर लिखवा रहा हो. उन दिनों उन्हें हुक्का पीने का शौक था. हुक्का पीते जाना व लिखते जाना (कुछ वर्षों बाद उन्होंने हुक्का पीना छोड़ दिया) जहां कहीं कोई बात भूल जाती, तभी उन की पुत्री या पुत्र पं. सोमदत्त (जो उस समय दो तीन साल के थे) बोल कर उन्हें लिखवा देते.

पंडित जी में अचानक आई हुई तबदीली के लिए बिल्कुल तैय्यार नहीं थे पर उन के पास इस के इलावा और कोई रास्ता भी नहीं था. जब बच्चों ने भी लाल किताब के पाठ उन्हें बताने शुरू कर दिए तो वे काफी चिन्तित हुए व सोचते रहे कि एक तो इस ताकत ने मेरा जीना दूभर कर दिया है व अब मेरे बच्चों पर भी काबू पर लिया है. धीरे धीरे पं.जी इसे उस की रजा समझ कर इस नए इल्म के प्रवर्तक बन गए।

इस शिक्षा के मिलते ही पंडित जी ने अपना आजीवन यज्ञ शुरू कर दिया. सुबह दफ्तर जाने से पूर्व एक दो घंटे ने जन्म कुंडलियां देखते व रविवार को तो उन के यहां जैसे मेला ही लग जाता. वो किसी से कोई फीस न लेते और यदि कोई कुछ देने की कोशिश भी करता तो उसे दोबारा वहां न आने को कह देते. पंडित रूप चंद जी अपने असूलों के बहुत पक्के थे. चाहे कोई डिप्टी कमिश्नर हो या चपरासी, सभी को अपनी बारी की इंतजार करनी पड़ती थी. पंडित जी इस ज्ञान को बांटना भी चाहते थे, इसी लिए उन्होंने लाल किताब के नाम से पांच किताबें लिखीं. ये किताबें बिना कोई लाभ बनाए, लागत पर बेची गईं व पं जी जिसे इस के योग्य समझते, उसे किताबें मुफ्त में भी दे देते.

उस समय भारत आजाद देश नहीं था, कोई सरकारी मुलाजिम अंग्रेजी सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी प्रकाशित नहीं कर सकता था. इसी लिए पंडित जी ने अपने एक रिश्ते के भाई पंडित गिरधारी लाल शर्मा, जो इन के बहुत घनिष्ट थे, उन के नाम से यह किताबें प्रकाशित करवाईं, लेखक का नाम नहीं लिखा.

मेरी उन के साथ आखिरी मुलाकात में उन्हों ने बताया कि उन्हें अंग्रेज सरकार की अनुमति तो मिल जाती क्योंकि अंग्रेज अफसर भी उन से अपने बारे में अक्सर पूछते रहते थे व उन की बहुत इज्जत करते थे. पर पंडित जी अपनी प्रसिद्धि कतई नहीं चाहते थे इसी वजह से उन्होंने हमेशा मीडिया को इन्टर्व्यू देने से इनकार किया व कभी किसी को अपनी फोटो नहीं खींचने दी. जीवन के अंतिम दिनों में पास के गांव रुड़का कलां के स्व. सरदार सोहन सिंह, व अंबाला के श्री अशोक भाटिया को खुद कह कर अपनी फोटो खिंचवाई), वे कहा करते थे

“जिस किसी की किस्मत में मेरे से फायदा उठाना लिखा है वो यहां खुद ही पहुंच जाएगा. उस पर मेरी दहलीज के अंदर आने का सबब खुद-ब-खुद बन जाता है..”

पंडित रूपचन्द जोशी जी के देहावसान (दिसम्बर 24, 1982)

गत वर्षों में, पंडित जी के देहावसान (दिसम्बर 24, 1982) के बाद कुछ लोगों ने यह बात उड़ा दी कि लाल किताब फारस या अरब से आई और उस का पं.जी ने अनुवाद कर दिया. अगर ऐसा है तो कहां है वो मूल अरबी/फारसी की पुस्तकें? उन देशों में किसी न किसी के पास तो वे जरूर होंगी. एक प्रतिष्ठित सज्जन, जिन की लाल किताब पर लिखी हुईं कई किताबें छपी हैं, और विशेषतः एक किताब तो बहुत पठनीय है, उन्हों ने लिखा है कि लाल किताब पद्धति सदियों से हिमाचल व काश्मीर की घाटी में प्रचलित थी,

और किसी ने इस को अपने शब्दों में लिख कर किसी अंग्रेज को दिया जिस ने वह पुस्तक पंडित जी (Lal kitab astrologer India) को पढ़ने के लिए दे दी व पं. रूप चंद जी ने इसे छपवा दिया. यह बिल्कुल उनकी कल्पना है. मेरा उन महानुभव से एक ही सवाल है- अगर यह सत्य है कि यह प्रणाली काश्मीर और हिमाचल में प्रचलित थी तो आज हिमाचल व काश्मीर समाप्त तो हो नहीं गए. इतने हजारों लाखों लोगों में से कोई एक तो होगा जिस के पास पं. रूप चंद जी से पहले का लाल किताब का कुछ न कुछ ज्ञान हो. किस गुफा में छिपे बैठे हैं वो लाल किताब के ज्योतिषी?

बहुत लोगों को पंडित रूप चंद जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. मैं उन में से एक हूं. मैं पहली बार उन्हें 1966 में मिला. उस समय पंडित जी कहीं बाहिर से आए थे. लंबे कद के, पैन्ट कोट पहने हुए चुस्त दुरुस्त लग रहे थे. मुझे और मेरे बड़े भाई श्री सतीश भाटिया को बहुत प्यार से मिले. उन से वो पहले कई दफा मिल चुके थे व उन में कुछ ऐसा देखा था कि हमेशा ही उन पर मेहरबान रहे.

बाद में उन्होंने हमेशा मुझ पर भी सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाई रखी. मुझे वहां पास बैठने की हमेशा इजाजत दी वरना स्पष्ट वक्ता होने के कारण लोगों से कह देते थे कि तुम्हारा काम हो गया है अब जगह खाली करो. हमारे पिता जी की पत्री देखते ही बोले इन्हें अपने चाचा के साथ ही मिल कर व्यापार करना चाहिए. इसी में इन का भला है. उन्हे कहो कि अलग से काम करने की सोचें भी नहीं. पिता जी शुरू से अपने चाचा के साथ मिल कर काम करते थे पर उन दिनों अलग होने की सोच रहे थे. यह बात तो उस समय हमें भी मालूम नहीं थी कि वे अलग होने की सोच रहे थे. बहुत हैरानगी हुई कि 25-30 सैकिंड में उन्होंने यह बोल दिया और कुछ भी ऐसी बातें कहीं जो आज भी सही उतर रही हैं.

लेकिन मुझे एक बात बहुत अजीब लगी कि हर बार हर ग्रह के लिए वो लाल किताब (1952) खोलते व उस में से कुछ पंक्तियां पढ़ते व फिर उन कि व्याख्या करते. मैंने यह सोता कि सुनने में तो आया था कि लाल किताब इन्हीं की लिखी हुई है लेकिन ये किताब बार बार क्यों खोलते हैं. बरसों बाद जब उन से यह सवाल पूछने की हिम्मत हुई तो वे हंस पड़े व बोलने लगे कि एक तो इस तरह फलादेश देखने में कोई गलती नहीं होती व दूसरा, लाल किताब बार बार पढ़ने से अपना भेद खुद ही खोलती है, यही तो किताब में लिखा है. पं. जी अपने जीवन के अन्त तक, किताब खोल कर ही कुंडली विश्लेषण करते थे.

हर बार उनके पास जाने पर मैंने आश्चर्यजनक विश्लेषण देखे. हमारे एक रिश्तेदार का जन्म समय मालूम नहीं था सिर्फ उन की तस्वीर हमारे पास थी. उसी पर से पं. जी ने उन के घर का नक्शा बना दिया. आंखों की बनावट व गहराई देख कर शनि व कानों की बनावट से केतु की जगह कुंडली में स्थिर कर दी. एक एक कर के बाकी ग्रह भी लगा दिए. घर की खिड़किओं, दरवाजों, छत तक की खासियतें बता दिं. घर का बिल्कुल सही नक्शा बना दिया. एक इन्सान जो सामने भी नहीं था, सिर्फ उसकी एक फोटो मात्र से इतना कुछ बता देना एक बहुत अचम्भे की बात है.

जब वहां बैठे लोगों ने आश्चर्य चकित हो कर पूछा कि आप ने यह सब कैसे कर लिया तो पं. जी ने मजाक में कहा कि मैं ने भूत पाल रखे हैं मुझे उन से सारी जानकारी मिल जाती है. पर फिर उन्होंने कहा कि यह लाल किताब के इल्म का कमाल है वरना मैं क्या चीज हूं. कितने दरवेश तबीयत के थे पंडित रूप चंद जी.

Father of Lal Kitab Pt. Roopchand Joshi

हमारे परिवार के एक मित्र थे शर्मा जी (नाम बदल दिया है) उनका लड़का दस साल पहले घर से भाग गया था. बहुत खोज की गई पर कुछ पता न चल सका. एक दिन उन के साथ लाल किताब का जिक्र हो गया व उन्हें पंडित रूप चंद जी के बारे में बताया. वह सज्जन तभी रविवार के दिन फरवाला पहुंचे व पं. जी से मिले. पंडित जी ने पत्रिका देखते ही सिर्फ एक सवाल पूछा कि:
“क्या घर में कोई पागल है?”
इनकी पत्नी अपना मानसिक संतुलन खो बैठी थीं बेटे की वजह से.
“क्या तुमने कारोबार बदला था तकरीबन 10-11 साल पहले?”
उन्होंने सरकारी नौकरी से ऊपर की कमाई बनाई थी, उसे छोड़ कर व्यापार करना शुरु किया था.
अगला सवाल थाः
” तो फिर घर से कौन गायब हो गया?”

पुष्टि हो जाने पर उन्हें बताया कि आप का पुत्र जीवित है, कोई खास तरह की मिठाई चलते पानी में बहाने की सलाह दी तथा कहा कि 30 दिन के बाद मुझे रिपोर्ट देना कि उस की कोई खबर या चिट्ठी मिली है या नहीं? यह सारी बात तीन मिनट से कम समय में खत्म हो गई. उपाय उसी दिन कर दिया गया. तीन सप्ताह बाद सुबह के समय उन के बेटे ने दरवाजा खटखटा दिया, उस ने बताया कि पिछले दो सप्ताह से उस के दिल में बहुत बेचैनी हो रही थी कि वह घर वापिस जाए. शर्मा जी पंडित जी से मिलने अपने बेटे को साथ ले कर गए. वहां पहुंच कर उन्होंने पंडित जी को एक बढ़िया कश्मीरी शाल भेंट करने की गलती कर दी. पंडित जी बरस पड़ेः

“क्या मैंने तुम्हें इस लिए कहा था कि एक महीने बाद आना? लाओ माचिस ताकि मैं इस शाल को तीली लगा दूं (जला दूं) मेरे लिए यह लेना कफन लेने के बराबर होगा. सुन तेरा बेटा आ गया है तो जा खुशियां मना और ऊपर वाले का शुक्रिया कर. मैं ने इस में क्या किया है? सिर्फ मेरी किस्मत में इस बात का यश लेना लिखा था वरना तेरे बेटे को तो घर देर सबेर आ ही जाना था.भला मैं कौन होता हूं उसे घर पहुंचाने वाला.”

उन्होंने मेरे विवाह से पूर्व ही मुझे बता दिया था कि जब भी मेरे बच्चे होंगे उन का बृहस्पति आठवें घर का ही होगा. पहले बेटी हुई. उस की जन्मकुंडली पंडित जी ने ही बनाई. उस का गुरू 8वें घर का है. फिर पुत्र का जन्म हुआ उस की कुंडली भी मैंने उन से ही बनवाई. आप का अनुमान सही है- उस का गुरू भी 8वें घर का है.

सभी लोग जो पंडित जी को मिले हैं या पास बैठे हैं ऐसी आश्चर्यजनक बातें उन्हें हर बार देखने को मिलती थीं. बाद के वर्षों में, इतने साधारण से दिखने वाले पंडित रूप चंद जी को शायद कोई अनपढ़ बुजुर्ग या साधारण किसान समझने की गलती कर सकता था. लेकिन उन की आंखों में एक गजब की चमक थी. ठेठ पंजाबी, खालिस उर्दू, व बढ़िया अंग्रेजी बोलने वाले, हाजिर जवाब, मजाकिया लेकिन बहुत जल्दी गर्म व शीघ्र ही नरम हो जाने वाले थे पं. जी. यदि कोई उन का समय व्यर्थ करने कि कोशिश करता था या जब वे कुंडली को प्रमाणित करने के लिए कोई व्यक्तिगत सवाल पूछ लेते और उस का उन्हें खुली तरह से जवाब न दिया जाता तो वे नाराज हो जाते.

उनकी कचहरी में कोई भी समस्या प्राईवेट नहीं थी. सब बातें पब्लिक के सामने खोली जाती थीं. कोई उपाय छुपाया नहीं जाता था मजा तब आता था जब कोई नया नया अंग्रेजी सीखा हुआ या कमजोर अंग्रेजी जानने वाला उन्हें प्रभावित करने के लिए उन से गुलाबी अंग्रेजी में बोला करता तो उस की मुसीबत पंडित जी के हाथों आ जाती, वे उसकी अंग्रेजी के अध्यापक की तरह ग्रामर की क्लास ले लेते. कौतूहलवश एक बार उन्होंने मुझ से पूछ लिया कि अमेरिका व इंग्लैंड की अंग्रेजी में क्या फर्क है. सौभाग्य से मुझे एक कोर्स लेना पड़ा था, जिस का उद्देश्य ब्रिटिश प्रणाली के पढ़े हुए विद्यार्थियों की अंग्रेजी का अमेरिकीकरण था. उस दिन इज्जत बची ही नहीं बल्कि बढ़ भी गई. उन्हें यह अंतर बहुत रोचक लगे.

पंडित जी की सादगी और उनके पक्के असूलों का एक और उदाहरण देखें, पंडित जी कभी किसी को अपने पांव छूने की इजाजत नहीं देते थे. एक बार की बात है कि मैं अमेरिका से जब भारत वापिस आया तो अपने बड़े भाई साहिब के साथ पंडित जी के दर्शन करने फरवाला गया. उनकी बैठक सजी हुई थी, बहुत से लोग अपनी अपनी समस्याएं लेकर पंडित जी के दरबार में हाजिर थे, तब ही एक सज्जन ने उठ कर पंडित जी के पांव छू लिये, पंडित जी तो आग बबूला हो उठे और उसे नसीहत दी कि आइन्दा वो ऐसी हिमाकत न करे.

पंडित जी के गुस्से से तो मैं वाकिफ था, लेकिन तभी एक ऐसी घटना घटी कि जो उस समय मेरे लिये किसी आश्चर्य से कम न थी, पंडित जी अपने स्थान से उठे और उस व्यक्ति के पांव छू लिये,उस सज्जन की हालत देखने लायक थी उसके बाद पंडित जी ने उपस्थित समूह को संबोधित करते हुए चेतावनी दी कि वो आइन्दा कोई भी मेरे पांव छूने की कोशिश न करे, अगर छूना ही है तो वे अपने मां-बाप और बुजुर्गों के पांव छुयें- ऐसे थे हमारे पंडित जी. मैं जब आजकल के नौसीखिया तथाकथित ज्योतिषियों को बढ़े चाव से अपने पांव को हाथ लगवाते हुए देखता हूं, तो मुझे उनकी बुद्धि पर तरस आता है.

पिछले दिनों पंडित सोम दत्त जी ने एक बहुत रोचक बात पंडित रूप चंद जी के बारे में सुनाई जो मैं आप तक लाना चाहता हूं. एक दिन पास के गांव का एक आदमी बहुत हांफता हुआ पंडित जी के पास दोपहर आया. वह बहुत घबराया हुआ था व लगभग रोने को था. पंडित जी के पूछने पर उस ने बताया कि किसी ने दुश्मनी की वजह से पुलिस को उस की झूठी शिकायत कर दी है और पुलिस उसे ढूंढ रही है. आप को तो मालूम ही है कि अब मेरी क्या दुर्गति होने वाली है, कृपया मुझे बचाईए.

पंडित जी (Lal kitab astrologer India) ने उसी समय उस की कुंडली बनाई व कहने लगे कि चार किलो दाल चलते पानी में बहा दो. उस आदमी ने कहा पंडित जी मैं तो भागता हुआ यहां आ गया हूं मेरे जेब में तो इस समय सिर्फ आठ आने हैं. चार किलो दाल कहां से पाऊंगा. पंडित जी ने कुछ सोचा व उस से कहा जा चार आने की मिर्चें जला कर चलते पानी में बहा दे. तुझे कुछ नहीं होगा और आराम से घर जा. उस आदमी ने वही किया व डरता डरता घर पहुंचा.

वहां पुलिस उसका इंतजार कर रही थी. थानेदार ने गुस्से में पूछा ओए तुझे हम दो घंटे से ढूंढ रहे हैंस कहां छुपा हुआ था? उस आदमी ने कहा जी मैं तो फराले (फरवाले) पंडित जी के पास चला गया था, आप से बचने का तरीका पूछने. थानेदार ने पूछा तो पंडित जी ने क्या कहा है. वह बोला कि पंडित जी ने कहा है कि मैं बेकसूर हूं. उन्होंने मेरे से एक उपाय करवा दिया है और मुझे निश्चिंत हो कर घर जाने को कहा है. अब आगे आपकी मर्जी है.

थानेदार ने कहा जब पंडित जी ने कह दिया है कि तू बेकसूर है तो उन की बात गलत थोड़ा ही हो सकती है? उपाय भी तूने कर ही लिया है तो हम कौन होते हैं तुझे गिरफ्तार करने वाले. वह आदमी वापिस उल्टे पांव दौड़ता हुआ पंडित जी के पास फिर आ गया. पंडित जी ने पूछा अब क्या तकलीफ है तुझे, पुलिस तो तुझे हाथ नहीं लगा सकती थी, अब क्या हुआ. उस ने कहा कि महाराज मैं तो आप को बताने आया था कि थानेदार ने क्या कहा है.

Story 1

पांच सात साल पहले मैं (One lal kitab student) टोरंटो, कैनेडा में पं. सोम दत्त जी से मिलने गया था व उन के घर में ही ठहरा था. तभी एक बुजुर्ग लगभग 80 वर्ष के होंगे उन्हें मिलने आए व उन के दरवाजे की दहलीज को बार बार प्रणाम करते हुए अंदर आए. पता चला कि वे पंजाब के भूतपूर्व मंत्री थे व कैनेडा अपनी बेटी से मिलने आये थे. मेरा परिचय पंडित जी ने उन से करवाया व चाय के दौरान उन्होंने बताया कि वे हमेशा जब भी कभी फरवाला की तरफ से गुजरते तो पंडित जी के घर की दिशा में हाथ जोड़ कर प्रणाम किए बिना नहीं जाते थे.

दरअसल उन की एक बेटी थी जिस का वे रिश्ता किसी इन्जीनियर से कराना चाहते थे. लड़के का टेवा मिलवाने के लिए पंडित जी के पास लाए. उस इलाके के सभी लोग पंडित जी (Lal kitab astrologer India)की अनुमति के बिना कोई रिश्ता नहीं करते थे. इस वजह से लोग टेवे के अवगुण छिपाने के लिए कहीं और से लगन बदल कर दूसरा टेवा बनवा लाते थे या फिर गलत समय व तारीख देते थे. पंडित जी को मालूम हो गया कि क्या चालबाजी हो रही है इस लिए उन्होंने कहा कि “लड़के और लड़की की untouched photo ले कर आया करो.” वे फोटो से मिलान कर लेते थे.

यह मन्त्री जी अपनी बेटी और उस लड़के की फोटो ले कर पं. जी के पास पहुंचे और बताने लगे कि लड़का बहुत सुन्दर व होनहार है और बहुत अच्छे परिवार से है, इत्यादि. हम कल ही सगाई करना चाहते हैं अगर आप की इजाजत हो तो. पंडित जी ने फोटो देखी व पुष्टि के लिए दो तीन सवाल पूछे. फिर उन्होंने कहा कि अगर आप मेरी बात मानते ही हो तो इस सप्ताह रिश्ते का नाम भी मत लो. अगले सप्ताह रिश्ता कर लेना लेकिन इस सप्ताह बिल्कुल न तो कुछ कहो और न ही कुछ करो. बेदिली से मन्त्री मान गए.

तीन दिन बाद उस लड़के की बिजली के झटके से मृत्यु हो गई. मंत्री जी कहने लगे कि अगर लड़की का रिश्ता हो जाता या उस के बारे में बात भी बाहिर निकल जाती तो बहुत मुश्किल हो जाती लड़की की कहीं और शादी करनी. सभी कहते कि न जाने कौन सा दोष है उस में. उन की जिन्दगी में सब कुछ यह लड़की ही थी जिसे पंडित जी ने बाल बाल बचा लिया. मेरे लिए तो वे भगवान का रूप थे.

पचास के दशक में रिटायर होने के बाद पंडित जी वपिस फरवाला आ गए. अब तो हर समय जनता, मंत्री, सरकारी अफसर व व्यापारी, इन सब की लाईन लगी रहती थी. पंडित जी सूर्य डूब जाने के बाद कुंडली नहीं देखते थे. उन्होंने अपने घर से अलग अपनी बैठक बना रखी थी जिस में वो लोगों से मिलते थे. घर तो अब उन के पुत्र ने बेच दिया है लेकिन यह बैठक आज भी जोशी परिवार ने रखी हुई है, व उन के अनुसार वहां आज भी पंडित जी का बोर्ड लगा हुआ है- रूप चंद जोशी, रिटायर्ड एकाऊंट्स आफिसर, डिफैन्स एकाऊंट्स, विलेज फरवाला, वाया बिलगा, जिला जालंधर. इन के इकलौते पुत्र पंडित सोम दत्त अब कैनेडा में अपने दो बेटों के साथ रहते हैं, पं. सोम दत्त का एक पुत्र इकबाल चंद पंचकूला में रहता है.

Story 2

जैसा कि पहले जिक्र किया है, कुछ ग्रह ऐसे होते हैं जो ग्रह फल के कहलाते हैं जिन का उपाय आम आदमी की ताकत से बाहिर है. पंडित जी (Lal kitab astrologer India) को कई सिद्धियां अपने आप कुदरत की तरफ से मिली हुईं थी. जिस से वह ग्रह फल का उपाय भी कर लेते थे. वे अपने एक विशेष पैन से, जिसे वे लाल कलम कहते थे, हुक्म लिख देते थे, जो जरूर पूरा हो जाता था. इस के जरिए उन्होंने तरक्की के हुक्म दिए, बदलियां करवाईं व रुकवाईं, नौकरियां दिलवाईं, मन चाहे कालेजों में दाखिले के हुक्म निकाले व मुकदमों के फैसले तक करवा दिए, इत्यादि.

यहां तक कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कई फांसी के हुक्म रद्द करवा दिए. फौज में जाने वालों को वे सुरक्षा के तौर पर एक विशेष सिक्का दिया करते थे जो उन की रक्षा करता था. फोजियों में यह बात फैली हुई थी कि फरवाले वाले पंडित जी से सिक्का ईशू करवा लो फिर कोई डर नहीं. अपने दोस्तों में वे रूप लाल के नाम से जाने जाते थे.

Story 3

पंडित रूप चंद जी प्रत्येक कुंडली बहुत सावधानी व जिम्मेदारी के साथ देखते थे. वे अक्सर पूरे परिवार की कुंडली देखना पसंद करते थे ताकि अगर किसी प्रकार का पैतृक ऋण हो तो उस का इलाज किया जा सके. उन्होंने कभी किसी के घर जा कर कुंडली नहीं देखी. राजा महाराजा तक मिलने उनके घर पहुंचते थे. किसी से कुछ लेते नहीं थे, इस लिए वे अपनी शर्तों से रहते थे.

उनके पुत्र पं. सोम दत्त ने मुझे बताया कि मैं शिकायत किया करता था कि आप ने जिंदगी में क्या कमाया है, जब से होश संभाला है घर में भीड़ ही देखी है इस का क्या लाभ हुआ है आप को? पंडित जी बोले किसी दिन देखना कि मैंने क्या कमाया है इस से. हुआ यूं कि पंडित रूप चंद जी 70 के दशक में एक बार बहुत बीमार हो गए व उन्हें आल इंडिया इन्स्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साईन्सिज, देहली में ले जाया गया. जैसे ही वे वहीं पहुंचे, सभी वरिष्ठ डाक्टरों की भीड़ लग गई. लोग यह न समझ पाए कि ऐसा कौन सा वी.आई.पी. आ गया है. उस समय पंडित जी ने अपने पुत्र से कहा कि यह है मेरी जिंदगी की कमाई. देख ये डाक्टर किस तरह मेरे लिए भाग दौड़ कर रहे हैं और मेरी सेवा में लगे हैं.

देखने वाले हैरान हैं कि कौन है यह देहाती जिस का इतना मान हो रहा है. मैं तुझे यही दिखाने यहां लाया हूं. वरना ठीक तो मैं लुधियाने के अस्पताल में भी हो जाता.

कई बार वे कुछ खरीदने के लिए या किसी और काम से साइकिल पर फिलौर जाते (जो पास का बड़ा शहर है). फिलौर में पंजाब पुलिस का सबसे बड़ा ट्रेनिंग सेंटर है व अक्सर बड़े ओहदे के पुलिस पदाधिकारी यहां ट्रेनिंग के लिए आते हैं. पंडित जी को पहचान कर उन्हें अपनी कार या जीप से उतर कर पूरे आदर सहित प्रणाम करते व बार बार आग्रह करते कि आप को वापिस फरवाला छोड़ आते हैं, कहां इतनी दूर साइकिल चलाते हुए वापिस जाओगे. लेकिन वे कभी भी इस के लिए राजी नहीं हुए. वे किसी का अहसान नहीं लेना चाहते थे. उन के अनुसार यह इन के इल्म का दुरुपयोग करना था.

Story 4

बड़े से बड़े पदाधिकारी उन का कोई भी कार्य करने के लिए उन के आदेश का इंतजार करते थे लेकिन पंडित जी (Lal kitab astrologer India) ने ऐसा आदेश कभी उन्हें कभी दिया ही नहीं। हां एक बार पंजाब के एक मंत्री अड़ गए कि मुझे आप कोई मौका जरूर दें, उस समय पंडित जी ने उन्हें गांव तक पक्की सड़क बनवाने के लिए कहा. पक्की सड़क बिल्कुल पंडित जी के घर के दरवाजे तक आती है व उन की सारी गली भी पक्की कर दी गई थी ताकि आने जाने वालों को कोई मुश्किल न हो.

मैं (One lal kitab student) पंडित जी से आखिरी बार उन के देहान्त से दो सप्ताह पहले मिला. जब मैं वहां से चलने लगा तो मैंने कहा कि पंडित जी हूं तो मैं आप से बहुत छोटा, लेकिन मेरी प्रार्थना है कि प्रभु आप की सेहत बनाए रखें, आप से अगले साल फिर भेंट करूंगा. वे बोले बस भई अब यह नरक चौरासी कटने वाला है और मैं जाने की तैय्यारी में हूं, और तू मुझे रुकने को कह रहा है. देख कितनी मुश्किल कटी है मेरी जिन्दगी. लोगों ने दिन को चैन हीं लेने दिया और इन गैबी ताकतों ने रातों को मुझे सोने नहीं दिया. बस मुझे तो दुनिया में इसी काम के लिए भेजा था. परिवार को भी तंगी में रखा व खुद भी पब्लिक के सामने दिन भर, नहीं, अब पंडित जी के साथ तेरी यह आखिरी मुलाकात है. तब मैंने उन से यह पूछा कि उन के पास लाल किताब कहां से आई.

लाल किताब कहां से आई?

तब पंडित जी (Lal kitab astrologer India) ने मुझे कहा कि कुर्सी खींच ले व बैठ जा. हम ने पांच छः घंटे बात की व खाना भी इकट्ठे ही खाया. उन्होंने कहा कि लाल किताब के जरिए दो पिछली और दो अगली पीढ़ियों का हाल तो बखूबी बताया जा सकता है. उन्हें पिछले जन्म व आने वाले जन्म के बारे में भी पता चल जाता था लेकिन वे उस के बारे में कभी कभार ही बोलते थे क्योंकि उन के अनुसार उस से कोई फायदा नहीं होने वाला. वे भविष्य के बारे में बहुत ज्यादा नहीं कहते थे, उन का मानना था कि उस से क्या फायदा. जो आज तुम्हारे साथ हो रहा है और आगे के लिए जो मुश्किल दिखाई दे रही है, उसे संभालने की कोशिश करो और अपना बचाव करो.

कुछ लोगों को स्वप्न द्वारा दिए गए ज्ञान के बारे में सवाल उठाए हैं. लेकिन इस तरह का कुदरती करिश्मा कोई अनहोनी बात नहीं. अमेरिका में ऐड्गर केसी (Edger Cayce) भी तो ऐसे ही स्पप्न में सीखे थे लोगों को बीमारियों से निजाद पाने की शक्ति. क्योंकि वो अमेरिका में थे, उन के पास लोग थे जिन्होंने हर केस को नोट किया व उन की पूरी लाइब्रेरी बनी है विर्जिनिया बीच, विर्जिनिया में. हमारे यहां ऐसी कोई प्रथा नहीं है. पंडित जी की लिखी अनमोल पांडुलिपियां जोशी परिवार के पास हैं, यह मालूम नहीं कि उसे बाकी लोग कब देख पाएंगे.

पंडित जी को लिखने का बहुत शौक था. वे लिखते भी थे बढ़िया से बढ़िया पैन से. उन के पास दर्जनों मांट ब्लां, कार्टिए, पार्कर, शेफर इत्यादि के पैन थे जो उन्होंने खुद मुझे दिखाए. वे उन की निबों को स्लेट पर रगड़ कर मोटा उर्दू लिखने के लिए तैयार करते थे. बढ़िया कागज पर लिखते व खुद जिल्दसाजी भी करते थे. शायद पैन ही उन की एक कमजोरी थी जो मैंने ढूंढ ली थी. मेरे उपहार में दिए पैन वे हमेशा स्वीकार कर लेते थे. काफी समय तक पंडित डी को फटोग्राफी का शौक भी रहा. उन के पास लैंड कैमेरा था जिस में बड़ी प्लेट वाले नैगेटिव इस्तेमाल होते हैं.

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दिसंबर 24, 1982 का दिन था. पंडित जी अपनी चारपाई पर बैठे थे. सामने गली में से एक लड़का तीन चार बार गुजर कर गया. आखिर पंडित रूप चंद जी ने उसे रोक कर पूछा उस से:-

“क्यों काक, तू कौन है और बार बार चक्कर क्यों काट रहा है. अगर टेवा दिखाना है तो अंदर आजा अब तुझे क्या मना करना. पूछ क्या पूछना है.” उस ने कहा कि मेरी नौकरी नहीं लग रही, इन्टर्व्यू तो दे आया हूं लेकिन पता नहीं चल रहा. पंडित जी ने उस का टेवा देख कर कहा जिस घर में तू रात को सोया था, उसके पीछे लगने वाले घर में जो कोई बूढ़ा आदमी रहता है, उस के मरते ही तेरी नौकरी लग जाएगी. और वो बूढ़ा तो बस गया ही समझ.

पंडित जी के दोनों पोते इकबाल व राकेश जो उस समय उन के पास बैठे थे, उन्होंने कहा “बाबा जी आप यह क्या कह रहे हैं. यह तो हमारे पीछे वाले पड़ोसियों का दोहता है जो शहर से यहां आया है. यह तो आप ने अपनी तरफ ही इशारा कर दिया है. पंडित जी बोले: कि मौत का कोई इलाज नहीं और मुझे मौत का दिन सीधा सीधा बताने का हुकुम नहीं है, मगर इस लड़के के ग्रह ऐसा बोल गए हैं. जो होता है होने दो. राकेश ने पूछा कि कोई उपाय हो जो हम आप के लिए कर सकें. पंडित जी ने टाल मटोल कर दी व कोई उपाय नहीं बताया. उसी रात वे चिर निद्रा में सो गए. अगली सुबह उस लड़के को उस के पिता का तार आ गया कि उसे नौकरी मिल गई है.

पंडित रूप चंद जी आज तक के हुए महानतम ज्योतिषिओं में से एक थे. लाल किताब ही उन की कर्म भूमि थी व वही उन के जीवन का दर्शन शास्त्र था. कर्म योगी ऐसे कि सिवाए लाल किताब के उन्हें न अपनी चिंता थी न परिवार की. किसी दूसरे की समस्या को सुलझाना वे अपना परम नैतिक कर्त्तव्य समझते थे. उन का अपना तो यह हाल था कि धन्ने भगत दी गाईयां राम चरावे. इस में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि उन्हें भृगु, आर्यभट्ट, पराशर, अगस्त्य, कृष्णमूर्ति जैसे ज्योतिर्सम्राटों की श्रेणी में गिना जाए.

मेरा व सभी लाल किताब प्रेमियों की तरफ से उस महापुरुष को शत शत प्रणाम

तो दोस्तों ये थी पंडित जी की जीवनी । मै भी एक लाल किताब का विद्यार्थी होते हुए एक छोटा सा लाल किताब ज्योतिषी हूँ। आशा करता हूँ आपको ये लेख पसंद आया होगा।
लाल किताब ज्योतिषी Sahu ji इंदौर इंडिया

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